Thursday, 15 January 2026

पोंगल पर्व (PONGAL FESTIVAL)

पोंगल पर्व (PONGAL FESTIVAL)

पोंगल दक्षिण भारत, विशेषकर तमिलनाडु का एक प्रमुख और पारंपरिक फसल पर्व है। यह पर्व मुख्य रूप से सूर्य देवप्रकृतिपशुधन और किसानों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिए मनाया जाता है। पोंगल सामान्यतः 14 या 15 जनवरी को मनाया जाता है और यह चार दिनों तक चलता है।


पोंगल का अर्थ

तमिल भाषा में “पोंगल” का अर्थ है उफनना या उबाल आना। इस दिन नए चावल, दूध और गुड़ से बना प्रसाद जब उबलकर बाहर आता है, तो उसे शुभ माना जाता है। यह समृद्धि, खुशहाली और अच्छे भविष्य का प्रतीक है।


पोंगल पर्व के चार दिन

1. भोगी पोंगल

यह पर्व का पहला दिन होता है।

  • पुराने और अनुपयोगी सामान को जलाकर नए जीवन की शुरुआत का प्रतीक माना जाता है।

  • घरों की सफाई की जाती है।

  • इंद्र देव की पूजा की जाती है।


2. थाई पोंगल (सूर्य पोंगल)

यह मुख्य दिन होता है।

  • सूर्य देव को धन्यवाद दिया जाता है।

  • नए चावल, दूध और गुड़ से पोंगल प्रसाद बनाया जाता है।

  • घरों के सामने सुंदर कोलम (रंगोली) बनाई जाती है।

  • लोग पारंपरिक वस्त्र पहनते हैं।


3. मट्टू पोंगल

यह दिन पशुओं, विशेषकर गाय और बैलों को समर्पित होता है।

  • पशुओं को सजाया जाता है।

  • उन्हें विशेष भोजन दिया जाता है।

  • किसान पशुओं के योगदान के लिए आभार व्यक्त करते हैं।


4. कानुम पोंगल

यह आनंद और पारिवारिक मेल-मिलाप का दिन होता है।

  • लोग रिश्तेदारों और मित्रों से मिलते हैं।

  • पिकनिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं।

  • बहनें अपने भाइयों की लंबी उम्र की कामना करती हैं।


पोंगल का सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व

  • यह पर्व कृषि संस्कृति से जुड़ा हुआ है।

  • प्रकृति और पर्यावरण के प्रति सम्मान सिखाता है।

  • सामाजिक एकता और पारिवारिक प्रेम को बढ़ावा देता है।

  • यह पर्व मकर संक्रांति के आसपास मनाया जाता है।


निष्कर्ष

पोंगल केवल एक पर्व नहीं, बल्कि कृतज्ञता, समृद्धि और प्रकृति से जुड़ाव का प्रतीक है। यह हमें सिखाता है कि हम प्रकृति और पशुओं के बिना जीवन की कल्पना नहीं कर सकते। पोंगल भारतीय संस्कृति की समृद्ध परंपरा को दर्शाने वाला एक सुंदर और प्रेरणादायक पर्व है।

 

                                     

No comments:

Post a Comment